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उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ‘एवलांच’ का बड़ा खतरा: चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ के लिए ‘ऑरेंज अलर्ट’ जारी

On: March 20, 2026 3:25 PM
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: उत्तराखंड के चमोली और उत्तरकाशी में हिमस्खलन (Avalanche) का खतरा और ऑरेंज अलर्ट

देहरादून/ऋषिकेश: उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में एक बार फिर कुदरत का पहरा सख्त होता नजर आ रहा है। रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान (DGRE), चंडीगढ़ ने राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्रों के लिए हिमस्खलन (Avalanche) की गंभीर चेतावनी जारी की है। ताजा बुलेटिन के अनुसार, चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जैसे सीमांत जिलों में हिमस्खलन का खतरा सबसे अधिक बना हुआ है, जिसके चलते प्रशासन और स्थानीय निवासियों को अत्यधिक सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।

पांच जिलों में चेतावनी, तीन में ‘ऑरेंज अलर्ट’

रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान द्वारा जारी किए गए बुलेटिन में उत्तराखंड के पांच प्रमुख पहाड़ी जिलों को चिन्हित किया गया है। संस्थान ने चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों के लिए ‘ऑरेंज अलर्ट’ जारी किया है। इन क्षेत्रों में हिमस्खलन का खतरा ‘स्तर-3’ पर है, जिसे विशेषज्ञों ने ‘असुरक्षित श्रेणी’ माना है।

वहीं, रुद्रप्रयाग और बागेश्वर जिलों के लिए भी एडवाइजरी जारी की गई है, हालांकि यहाँ खतरा ‘स्तर-1’ (ग्रीन) पर दर्ज किया गया है, जिसका अर्थ है कि स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है लेकिन निगरानी की आवश्यकता है। यह अलर्ट शुक्रवार शाम 5 बजे से शनिवार शाम 5 बजे तक प्रभावी रहेगा।

2700 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र संवेदनशील

विशेषज्ञों के मुताबिक, जिन क्षेत्रों की ऊंचाई समुद्र तल से 2700 मीटर या उससे अधिक है, वहां बर्फ की परतें बेहद अस्थिर हो गई हैं। चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ के उच्च शिखरों पर जमी बर्फ की पुरानी और नई परतों के बीच पकड़ कमजोर होने के कारण मध्यम से बड़े आकार के हिमस्खलन की पूरी आशंका बनी हुई है।

अस्थिर बर्फ के चलते ढलानों पर भारी दबाव है, जो ज़रा सी हलचल या तापमान में बदलाव के कारण नीचे की ओर खिसक सकता है।
यही कारण है कि इन क्षेत्रों को फिलहाल इंसानी आवाजाही के लिए असुरक्षित घोषित कर दिया गया है।

प्रशासन की सलाह: अनावश्यक आवाजाही पर रोक

अलर्ट जारी होने के बाद स्थानीय जिला प्रशासनों ने भी कमर कस ली है। संवेदनशील इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों और वहां तैनात सुरक्षा बलों को विशेष सावधानी बरतने को कहा गया है। मुख्य दिशा-निर्देश इस प्रकार हैं:

  • ढलानों से बचें: बर्फ से लदे ढलानों और ढालू रास्तों पर किसी भी प्रकार की आवाजाही को पूरी तरह से टालने की सलाह दी गई है।
  • सुरक्षित मार्ग: यात्रा के लिए केवल उन्हीं मार्गों का चयन करें जिन्हें प्रशासन ने सुरक्षित घोषित किया हो।
  • सतर्कता: हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों (Avalanche Prone Zones) के पास रहने वाले लोगों को बैग तैयार रखने और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित ऊंचे स्थानों पर जाने के लिए तैयार रहने को कहा गया है।
  • पर्यटन पर असर: ट्रैकिंग और पर्वतारोहण गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगाने की संभावना है ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके।

बदलते मौसम ने बढ़ाई चिंता

हिमालयी क्षेत्रों में मौसम का मिजाज पल-पल बदल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बर्फबारी के बाद अचानक खिली धूप या तेज हवाएं बर्फ की परतों को असंतुलित कर देती हैं। उत्तराखंड पहले भी केदारनाथ त्रासदी और ऋषिगंगा (तपोवन) जैसी आपदाओं का गवाह रहा है, जहाँ हिमस्खलन और ग्लेशियर टूटने से भारी जान-माल का नुकसान हुआ था। इसी कड़वे अनुभव को देखते हुए रक्षा प्रतिष्ठान और आपदा प्रबंधन विभाग कोई ढील नहीं बरतना चाहता।

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विशेषज्ञों की राय

वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग और बदलते परिवेश के कारण हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में संवेदनशीलता बढ़ी है। बर्फ की सघनता में कमी आने से ‘स्लैब एवलांच’ का खतरा बढ़ जाता है। चूँकि वर्तमान में कई क्षेत्रों में बर्फ की परतें अभी जमी नहीं हैं और भुरभुरी अवस्था में हैं, इसलिए वे ढलान के साथ तेजी से नीचे आने की क्षमता रखती हैं।

निष्कर्ष:

उत्तराखंड के सीमांत जिलों में अगले 24 घंटे बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि आप इन क्षेत्रों की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो उसे फिलहाल स्थगित करना ही समझदारी होगी। प्रकृति के इस संकेत को गंभीरता से लेना और सुरक्षा मानकों का पालन करना ही जीवन रक्षा का एकमात्र उपाय है।

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