आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर उत्तराखंड कांग्रेस ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए सामाजिक वर्गों पर फोकस करना शुरू कर दिया है। पार्टी का लक्ष्य है कि ओबीसी, एससी-एसटी और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच अपनी पकड़ मज़बूत की जाए। इस उद्देश्य से संगठनात्मक ढांचे में इन वर्गों की भागीदारी बढ़ाई जाएगी और सामूहिक नेतृत्व को प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे एकजुटता के साथ भाजपा को टक्कर दी जा सके।
जातीय जनगणना से बदलेगी चुनावी तस्वीर
कांग्रेस नेतृत्व जातीय जनगणना को चुनावी मुद्दा बनाकर भाजपा को घेरने की तैयारी में है। पार्टी को उम्मीद है कि सामाजिक न्याय से जुड़े इस मुद्दे पर लोगों की भावनाएं उसके पक्ष में जाएंगी। हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर और उत्तरकाशी जैसे जिलों में ओबीसी जनसंख्या अधिक है, और इन क्षेत्रों में पार्टी की स्थिति पहले से सुधरी है। ऐसे में कांग्रेस इन इलाकों को चुनावी ताकत में बदलना चाहती है।
‘एकला चलो’ नहीं, सामूहिक नेतृत्व की ओर रुख
पार्टी हाईकमान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब व्यक्तिगत एजेंडा नहीं चलेगा, बल्कि सामूहिक नेतृत्व ही संगठन की प्राथमिकता होगा। सभी वरिष्ठ नेताओं को निर्देश दिए गए हैं कि वे एकजुट होकर कमजोर वर्गों के मुद्दों पर मुखर हों, खासतौर पर दलित बेटियों के साथ होने वाले उत्पीड़न पर स्पष्ट रुख अपनाएं। इससे कांग्रेस की सामाजिक संवेदनशीलता को जनता के सामने लाया जाएगा।
कमजोर वर्गों को साधकर सत्ता की राह तलाशती कांग्रेस
उत्तराखंड की 1.25 करोड़ जनसंख्या में बड़ी हिस्सेदारी ओबीसी और एससी-एसटी की है, जिसे कांग्रेस अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। लगातार चुनावी हार के बाद पार्टी अब बदली राजनीतिक हवा को भुनाना चाहती है। दिल्ली में हुई बैठकों में प्रदेश नेतृत्व को निर्देश दिए गए हैं कि वे इन वर्गों में गहराई से काम करें और कांग्रेस की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाएं।
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