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​Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026: आस्था से दुर्गम राह हुई सुगम, आज होमकुंड से कैलास के लिए विदा होंगी मां नंदा

On: September 20, 2026 7:30 AM
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Nanda Devi Raj Jat Yatra केवल एक धार्मिक यात्रा भर नहीं है, बल्कि यह देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक अस्मिता, अटूट आस्था और लोक-परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। बारह वर्षों के लंबे इंतजार के बाद आयोजित हो रही ऐतिहासिक Nanda Devi Raj Jat Yatra अब अपने अंतिम और सबसे भावुक पड़ाव पर पहुंच चुकी है। पातर नचौणियां, छेड़ी नाग, रूपकुंड, ज्यूंरागली और थाला उलारी जैसे अत्यंत जोखिम भरे व पथरीली पगडंडियों वाले पड़ावों को पार करते हुए मां नंदा की पावन डोली और भक्तजन शिलासमुद्र पहुंच चुके हैं।

​हिमालय की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा आज होमकुंड से अपने स्वामी भगवान शिव के धाम कैलास पर्वत के लिए विदा की जाएंगी। इस भावुक क्षण को देखने और माता के अंतिम दर्शन पाने के लिए हजारों श्रद्धालु नंगे पांव दुर्गम हिमालयी चोटियों को नापते हुए आगे बढ़ रहे हैं।

​12 साल बाद कैलास विदाई: Nanda Devi Raj Jat Yatra का सबसे भावुक क्षण

​हिमालयी क्षेत्रों में Nanda Devi Raj Jat Yatra को बेटी की मायके से ससुराल विदाई के रूप में देखा जाता है। मान्यता के अनुसार, मां नंदा अपने मायके (ध्याणी) लौटती हैं और 12 साल बाद पुन: अपने पति के घर कैलास प्रस्थान करती हैं।

​शनिवार को जब यात्रा दल रहस्यमयी रूपकुंड से ज्यूंरागली पास पर पहुंचा, तो माहौल पूरी तरह भक्तिमय और भावुक हो गया। ज्यूंरागली में मां नंदा की डोली के पहुंचते ही भक्तों की आंखें नम हो गईं। लोक-कथाओं के अनुसार, इस पड़ाव पर पहुंचकर मां नंदा स्वयं भावुक हो जाती हैं और अपने क्षेत्र बंड भूम्याल के प्रति विशेष स्नेह प्रकट करती हैं। भक्तों का कहना है कि मां की कृपा के कारण ही 16,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी और हड्डियों को जमा देने वाली ठंड भी श्रद्धालुओं का हौसला नहीं तोड़ पाई।

​ज्यूंरागली से आगे की राह: बंड भूम्याल की कटार से सुगम हुआ रास्ता

​समुद्रतल से अत्यधिक ऊंचाई और अत्यंत संकरे दर्रों के कारण ज्यूंरागली से आगे का सफर मौत को मात देने जैसा होता है। Nanda Devi Raj Jat Yatra में चार बार शामिल हो चुके बंड मंदिर समिति के संरक्षक शंभू प्रसाद बताते हैं कि जब ज्यूंरागली के आगे विकट चट्टानों के कारण मार्ग अवरुद्ध दिखता है, तो लोक मान्यता के अनुसार बंड भूम्याल अपने अस्त्र ‘कटार’ से मां के लिए रास्ता बनाते हैं।

​बंड भूम्याल द्वारा मार्ग सुलभ किए जाने के बाद ही मां नंदा की भव्य यात्रा ताला उलारी और शिलासमुद्र होते हुए निर्विघ्न होमकुंड की ओर अग्रसर होती है। यह अलौकिक विश्वास ही यात्रियों को हर कठिन परिस्थिति में आगे बढ़ने की अपार शक्ति प्रदान करता है।

​नर कंकालों की झील रूपकुंड और रहस्यमयी शिलासमुद्र

Nanda Devi Raj Jat Yatra का मार्ग कई प्राकृतिक व ऐतिहासिक रहस्यों से भरा हुआ है:

  • रूपकुंड का सम्मोहन: समुद्रतल से लगभग 14,800 फीट की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड को “कंकाल झील” (Skeleton Lake) कहा जाता है। इस झील में सदियों पुराने इंसानी कंकाल आज भी बिखरे पड़े हैं, जिन्हें इतिहासकार और स्थानीय लोग नंदा देवी राजजात के प्राचीन इतिहास और राजा यशधवल की कथा से जोड़कर देखते हैं। इस झील का पानी इतना स्वच्छ है कि व्यक्ति अपना प्रतिबिंब शीशे की भांति देख सकता है।
  • शिलासमुद्र का दृश्य: समुद्रतल से 14,600 फीट की ऊंचाई पर बसा शिलासमुद्र एक अत्यंत दुर्गम व अनोखा पड़ाव है। यहां दूर-दूर तक केवल विशालकाय पत्थर और चट्टानें ही दिखाई देती हैं, मानो पत्थरों का कोई अथाह समुद्र उमड़ पड़ा हो।

​होमकुंड में महायज्ञ के साथ होगी मां की विदाई

​आज होमकुंड (4,320 मीटर) में मुख्य हवन-पूजन और यज्ञाहुति सम्पन्न होगी। होमकुंड ही वह अंतिम बिंदु है जहां तक आम श्रद्धालु और मानव दल जाता है।

​यहां धार्मिक परंपरा के अनुसार चौसिंग्या खाडू (चार सींगों वाला नर भेड़) को श्रृंगारित कर, पूजित वस्त्र और फल-सामग्री समर्पित कर अकेले ही उच्च हिमालयी बर्फानी शिखरों की ओर विदा कर दिया जाएगा। माना जाता है कि यह चौसिंग्या खाडू ही मां नंदा का संदेश और भक्तों की भेंट लेकर कैलास तक जाता है।

​होमकुंड में महापूजा और आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद, मां नंदा की विदाई कर सभी यात्री जामुनडाली और सुतोल के रास्ते अपनी वापसी की यात्रा प्रारंभ करेंगे। Nanda Devi Raj Jat Yatra का यह महाअनुष्ठान देवभूमि में आपसी भाईचारे, पर्यावरण प्रेम और अगाध आस्था का अमर संदेश देता है। 

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