बाजपुर (ऊधम सिंह नगर): उत्तराखंड के तराई अंचल में मौसम के बदले कड़े मिजाज ने काश्तकारों की सालभर की कड़ी मेहनत पर पानी फेर दिया है। बाजपुर तहसील क्षेत्र में तेज आंधी, मूसलाधार बारिश और ओलावृष्टि के कारण धान की पकी फसल पूरी तरह से बिछ गई है। खेतों में खड़ी फसल के गिर जाने और पानी भर जाने से क्षेत्र में बड़े पैमाने पर Crop Damage in Bazpur का मामला सामने आया है। इस दैवीय आपदा ने न केवल पैदावार को प्रभावित किया है, बल्कि फसल की कटाई और मड़ाई की लागत को तीन गुना तक बढ़ाकर किसानों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
6,950 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल प्रभावित, 19 गांवों में शत-प्रतिशत नुकसान
तहसील प्रशासन की शुरुआती समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, इस बेमौसम प्राकृतिक आपदा की सबसे भीषण मार बाजपुर और आसपास के देहाती इलाकों में पड़ी है। प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक, क्षेत्र में लगभग 6,950 हेक्टेयर क्षेत्रफल में Crop Damage in Bazpur दर्ज किया गया है।
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सबसे चिंताजनक बात यह है कि तहसील के 19 गांवों में फसल पूरी तरह तबाह हो चुकी है, यानी वहां शत-प्रतिशत नुकसान का आकलन किया गया है। पकी हुई धान की बालियां पानी में डूबने और मिट्ठी में सड़ने के कगार पर पहुंच गई हैं। जो फसल कुछ दिन में कटकर मंडियों तक पहुंचने वाली थी, वह अब खेतों में ही सड़ रही है।
स्वरोजगार एवं उद्यमिता योजनाएँ
[ सामान्य कटाई (कंबाइन मशीन) ]
प्रति हेक्टेयर लागत: ₹7,000 – ₹8,000
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▼ (आंधी-ओले से फसल गिरी)
[ हाता द्वारा कटाई + थ्रेसर मड़ाई ]
मजदूरी (25 मजदूर): ₹12,500
थ्रेसर मड़ाई खर्च: ₹5,000
कुल लागत: ₹17,500 प्रति हेक्टेयर
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[ कुल अतिरिक्त बोझ: ₹7 करोड़ (6,950 हेक्टेयर) ]
मशीनें हुईं बेकार: क्यों बढ़ा कटाई और मड़ाई का खर्च?
तराई के इलाकों में किसान पारंपरिक रूप से धान की कटाई के लिए आधुनिक कंबाइन हार्वेस्टर मशीनों का उपयोग करते हैं। सामान्य परिस्थितियों में कंबाइन मशीन से कटाई कराने पर प्रति हेक्टेयर सात से आठ हजार रुपये का खर्च आता है, जिससे समय और पैसे दोनों की बचत होती है।
हालांकि, Crop Damage in Bazpur के कारण स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है:
- जमीन पर बिछी फसल: जमीन पर गिरी हुई फसल पर कंबाइन हार्वेस्टर चलाना असंभव हो गया है। मशीनें गिरी हुई बालियों को उठाने में नाकाम साबित हो रही हैं।
- मजदूरों पर निर्भरता: अब किसानों को विवश होकर हाथों से कटाई करानी पड़ रही है। अनुमान के मुताबिक, एक हेक्टेयर खेत की कटाई के लिए कम से कम 25 मजदूरों की जरूरत पड़ेगी।
- मजदूरी दर में वृद्धि: 25 मजदूरों की दिहाड़ी का खर्च ही लगभग 12,500 रुपये बैठ रहा है।
- थ्रेसर का अतिरिक्त खर्च: हाथ से काटने के बाद धान की मड़ाई के लिए अलग से थ्रेसर मशीन का सहारा लेना पड़ेगा, जिस पर करीब 5,000 रुपये प्रति हेक्टेयर का अतिरिक्त खर्च आएगा।
इस प्रकार, जहाँ पहले कटाई-मड़ाई का काम 8,000 रुपये में हो जाता था, वहीं अब प्रति हेक्टेयर कुल लागत बढ़कर 17,500 रुपये तक पहुंच रही है।
किसानों पर 7 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय भार और पैदावार में गिरावट की आशंका
कटाई और मड़ाई की प्रति हेक्टेयर लागत में लगभग 9,000 से 10,000 रुपये की सीधी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पूरी तहसील के प्रभावित 6,950 हेक्टेयर क्षेत्र के हिसाब से गणित लगाएं तो इस बार Crop Damage in Bazpur के चलते स्थानीय किसानों की जेब पर करीब 7 करोड़ रुपये का सीधा अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
| मद | सामान्य स्थिति (मशीन से) | आपदा के बाद (मजदूर + थ्रेसर) |
|---|---|---|
| कटाई खर्च | ₹7,000 – ₹8,000 / हेक्टेयर | ₹12,500 / हेक्टेयर (25 मजदूर) |
| मड़ाई खर्च | कंबाइन में शामिल | ₹5,000 / हेक्टेयर (थ्रेसर) |
| कुल लागत | ₹8,000 / हेक्टेयर | ₹17,500 / हेक्टेयर |
| अतिरिक्त बोझ | — | ₹9,500 / हेक्टेयर (कुल ₹7 करोड़) |
आर्थिक बोझ के साथ-साथ धान की गुणवत्ता को लेकर भी गहरी चिंताएं जताई जा रही हैं। खेतों में पानी जमा रहने से धान का दाना काला पड़ सकता है, जिससे बाजार में उसकी वाजिब कीमत नहीं मिलेगी। इसके अतिरिक्त, खेतों में नमी और मजदूरों की किल्लत के कारण कटाई में देरी होना तय माना जा रहा है।
पीड़ित किसानों का दर्द: सरकार से आर्थिक मदद और पारदर्शी सर्वे की मांग
आपदा की मार झेल रहे बाजपुर के किसानों ने शासन-प्रशासन से बिना किसी देरी के राहत सामग्री, वित्तीय मुआवजा और विशेष राहत पैकेज जारी करने की मांग की है।
”इस प्राकृतिक आपदा से किसानों की रीढ़ टूट चुकी है। सरकार को जल्द से जल्द वास्तविक नुकसान का निष्पक्ष आकलन कराकर उचित मुआवजा देना चाहिए। इसके साथ ही कटाई-मड़ाई के बढ़े खर्च को देखते हुए किसानों को अलग से आर्थिक सहायता दी जाए।”
— जोरावर सिंह भुल्लर, स्थानीय किसान
”जमीन पर बिछे हुए धान की कटाई का खर्च कई गुना बढ़ चुका है। अगर सरकार ने तुरंत विशेष राहत पैकेज देकर आर्थिक मदद उपलब्ध नहीं कराई, तो क्षेत्र का किसान कर्ज के बोझ तले दब जाएगा।”
— सतवंत सिंह पड्डा, प्रभावित काश्तकार
”कटाई में जितनी देरी होगी, धान की गुणवत्ता उतनी ही खराब होगी और पैदावार घटेगी। मंडियों में भी नमी वाले धान के दाम कम मिलेंगे। सरकार को तत्काल प्रभाव से किसानों को राहत राशि वितरित करनी चाहिए।”
— राणा इंदरपाल सिंह, किसान नेता
क्षेत्रीय किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही जिला प्रशासन से मुलाकात करने की तैयारी में है। किसानों की स्पष्ट मांग है कि प्रशासनिक टीमें हर गांव में जाकर धरातल पर पारदर्शी और निष्पक्ष सर्वे करें, ताकि कोई भी पात्र किसान सरकारी सहायता से वंचित न रहने पाए।
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