RBI Repo Rate Hike: महंगाई की मार के बीच रिजर्व बैंक बढ़ा सकता है ब्याज दरें, जानें आपके लोन EMI पर असर
RBI Repo Rate Hike को लेकर भारतीय बैंकिंग और वित्तीय बाजार में हलचल तेज हो गई है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, अंतरराष्ट्रीRBI Repo Rate Hike: महंगाई की मार के बीच रिजर्व बैंक बढ़ा सकता है ब्याज दरें, जानें आपके लोन EMI पर असरय बाजार में कच्चे तेल के चढ़ते दाम और कमजोर मानसून की वजह से देश में महंगाई का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय समीक्षा बैठक सोमवार, 5 अक्टूबर से शुरू हो रही है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि 7 अक्टूबर को आने वाले फैसले में रिजर्व बैंक नीतिगत दरों में बढ़ोतरी कर सकता है।
RBI Repo Rate Hike की क्या है मुख्य वजह?
अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मोर्चे पर बिगड़ते हालात ने केंद्रीय बैंक के सामने नीतिगत दरें बढ़ाने के अलावा कोई आसान रास्ता नहीं छोड़ा है। अगस्त की मौद्रिक नीति बैठक के बाद से आर्थिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है।
हर दिशा से जुड़ रहा "उत्तराखण्ड"
- कच्चे तेल की ऊंची कीमतें: अगस्त में ब्रेंट क्रूड ऑयल औसतन 91 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था, लेकिन सितंबर के महीने में कीमतें 100 डॉलर के पार निकल गईं। मिडिल ईस्ट में जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण आपूर्ति में रुकावट आई, जिससे 9 सितंबर को कच्चा तेल 113 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू गया। सितंबर के अंत में यह 103 डॉलर पर बंद हुआ, जो आरबीआई के 85 डॉलर प्रति बैरल के बेसलाइन अनुमान से काफी अधिक है।
- कमजोर मानसून का असर: देश के कई हिस्सों में मानसूनी बारिश कम रहने की वजह से खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित हुई है। खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से खुदरा महंगाई दर पर सीधा असर पड़ा है।
केनरा बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री माधवन कुट्टी जी के अनुसार, महंगे क्रूड और खाद्य पदार्थों के चलते चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में खुदरा महंगाई 6.2% से 6.3% तक पहुंच सकती है, जो रिजर्व बैंक के तय 6% के सुरक्षित दायरे से बाहर है।
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RBI Repo Rate Hike से लोन और EMI पर कितना असर पड़ेगा?
यदि मौद्रिक नीति समिति 7 अक्टूबर को 0.25% (25 बेसिस पॉइंट्स) की बढ़ोतरी का ऐलान करती है, तो रेपो रेट वर्तमान दर से बढ़कर 5.50% हो जाएगी। इससे बैंकों की फंडिंग लागत बढ़ जाएगी, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
महंगे होंगे होम लोन और ऑटो लोन
बैंक रेपो रेट से जुड़े सभी प्रकार के लोन (EBLR/RLLR) की ब्याज दरों में तुरंत बढ़ोतरी करेंगे। इसका मतलब है कि होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन की दरें महंगी हो जाएंगी, जिससे ग्राहकों की मासिक किस्त (EMI) बढ़ जाएगी या लोन की अवधि लंबी हो जाएगी।
त्योहारी सीजन में ग्राहकों के खर्च पर असर
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस के अनुसार, त्योहारी सीजन के मुहाने पर दरों में बढ़ोतरी होने से उपभोक्ताओं की खरीदारी क्षमता पर असर पड़ सकता है। हालांकि, जून तिमाही में देश की जीडीपी ग्रोथ 7.8% रही थी, जो रिजर्व बैंक के अनुमान से अधिक है। यस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंद्रनील पान का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का ढांचा मजबूत है और यह दरों में मामूली बढ़ोतरी का बोझ आसानी से सहन कर सकता है।
RBI Repo Rate Hike पर क्या है अर्थशास्त्रियों की राय?
हाल ही में किए गए वित्तीय सर्वे के अनुसार, 21 में से 20 शीर्ष अर्थशास्त्रियों का स्पष्ट मानना है कि रिजर्व बैंक इस बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी का कदम उठाएगा। केवल एक विशेषज्ञ ने दरों को स्थिर रखने की संभावना जताई है।
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक और घरेलू स्तर पर उभरे नए जोखिमों के कारण दरों में बढ़ोतरी का नया चक्र अनुमान से पहले शुरू हो सकता है। कुछ जानकारों का यह भी अनुमान है कि यदि महंगाई पर काबू नहीं पाया गया, तो आने वाले समय में रेपो रेट 6% के स्तर को भी छू सकती है।
RBI Repo Rate Hike के पीछे वैश्विक बाजार का दबाव
घरेलू मोर्चे के अलावा अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक नीतियां भी रिजर्व बैंक पर दबाव बना रही हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व सहित दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंकों ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए नीतिगत दरों में सख्ती जारी रखी है।
- बॉन्ड यील्ड का घटता अंतर: अमेरिका में दरें बढ़ने से भारत और अमेरिका के 10 साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड का अंतर घटकर 189 बेसिस पॉइंट्स रह गया है। वर्तमान में भारत की बॉन्ड यील्ड 7.21% है, जबकि अमेरिका की 5.32% पर है।
- विदेशी निवेशकों का रुख: यील्ड का अंतर ऐतिहासिक रूप से कम होने से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) भारतीय बाजार से पैसा निकालकर अमेरिकी बाजार की ओर रुख कर सकते हैं।
- डॉलर की मजबूती: बंधन एएमसी के सीआईओ सुयश चौधरी के अनुसार, मजबूत अमेरिकी डॉलर और महंगी कमोडिटीज को देखते हुए भारत को वैश्विक मौद्रिक रुख के साथ तालमेल बनाकर चलना अनिवार्य हो गया है।
7 अक्टूबर को रिजर्व बैंक के गवर्नर द्वारा किए जाने वाले ऐलान पर देश के शेयर बाजार, बैंकिंग क्षेत्र और आम मध्यमवर्गीय परिवारों की निगाहें टिकी रहेंगी।










