Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 – उत्तराखंड की लोक संस्कृति, अटूट आस्था और पवित्र भाई-बहन के रिश्ते की प्रतीक मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा अपने दिव्य मार्ग पर आगे बढ़ते हुए ऐतिहासिक वाण गांव पहुंच गई है। कनोल गांव से लगभग नौ किलोमीटर की पैदल यात्रा तय करके जब देव डोलियां वाण गांव पहुंचीं, तो वहां का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया।
वाण गांव में मां नंदा का उनके धर्म भाई लाटू देवता से भावुक मिलन हुआ। इसके साथ ही कुरुड़ से चली मां राजराजेश्वरी की डोली का भी नंदा डोली से पवित्र समागम हुआ। इस अलौकिक और हृदयस्पर्शी दृश्य को देखकर मौके पर मौजूद हजारों श्रद्धालुओं की आंखें श्रद्धा और भक्ति से छलछला गईं।
Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026: पौराणिक परंपराओं और लोक जागरों से हुआ स्वागत
वाण गांव पहुंचने पर स्थानीय ग्रामीणों ने सदियों पुरानी पौराणिक परंपराओं, लोकगीतों और जागरों के गायन के साथ देव डोलियों का भव्य स्वागत किया। वाण गांव स्थित नंदा देवी चौक में कुरुड़ दशोली की नंदा डोली, बंड की नंदा डोली, ल्वाणी की ज्वाल्पा देवी की डोली, बंड भूमियाल की छंतोली और गेदाणु देवता की छंतोली का आगमन हुआ।
जब बधाण भ्रमण के बाद मां राजराजेश्वरी की डोली नंदा चौक पहुंची, तो बहनों के परस्पर मिलन का दृश्य अत्यंत भावविभोर कर देने वाला था। इस दौरान लाटू देवता ने यात्रा में शामिल सभी देव डोलियों और उपस्थित जनसैलाब को अपना दिव्य आशीर्वाद प्रदान किया। वाण गांव के निवासियों ने ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा को चरितार्थ करते हुए दूर-दराज से आए यात्रियों की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी।
बाला द्यौसिंह देवता और लाटू देवता की अगवान के रूप में भूमिका
लोक जात यात्रा के अंतर्गत मां राजराजेश्वरी की यात्रा मुंदोली से शुरू होकर वाण गांव पहुंची थी। मुंदोली में मां राजराजेश्वरी के धर्म भाई बाला द्यौसिंह देवता के जन्मस्थान पर परिक्रमा कर आगे की यात्रा की अनुमति ली गई। मान्यतानुसार, बाला द्यौसिंह देवता ने अवतरित होकर मां राजराजेश्वरी के लिए मार्ग प्रशस्त किया। इसके बाद लोहाजंग गांव के नंदा चौक में पिनाऊ, घेस, बलाण, सुया और बानुड़ी सहित कुमाऊं से आईं महिला श्रद्धालुओं ने पारंपरिक जागर गाकर मां को भावभीनी विदाई दी।
हिमालयी लोक संस्कृति में बाला द्यौसिंह देवता और लाटू देवता युगों-युगों से इस कठिन यात्रा में अगवान यानी ‘पथ प्रदर्शक’ की भूमिका निभाते आ रहे हैं। द्यौसिंह देवता वर्तमान में सुतोल गांव में भूमियाल (भूमि के देवता) के रूप में पूजे जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दोनों लोक देवताओं की उपस्थिति और अनुमति के बिना कैलाश मार्ग की आगे की दुर्गम यात्रा को संभव नहीं माना जाता।
निर्जन पड़ाव गैरोलीपातल की ओर बढ़े कदम
वाण गांव में सुबह की विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद सभी देव डोलियां लाटू देवता के मंदिर में भाई का आवाहन करेंगी। इसके बाद लाटू देवता आगे के निर्जन मार्गों के लिए यात्रा की अगुवाई करेंगे और औपचारिक अनुमति प्रदान करेंगे।
वाण गांव के बाद Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 का सफर अब मानवी आबादी से दूर उच्च हिमालयी और निर्जन पड़ावों की ओर प्रवेश कर रहा है। वाण से प्रस्थान करने के बाद यात्रा का अगला पड़ाव गैरोलीपातल निर्धारित किया गया है, जहां श्रद्धालु रात्रि विश्राम करेंगे। यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध लोक विरासत और सामाजिक समरसता की अद्वितीय मिसाल भी प्रस्तुत करती है।
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