देहरादून/नई दिल्ली। भारतीय खेल जगत के लिए आज का दिन बेहद दुखद और एक अपूरणीय क्षति लेकर आया है। देश के महानतम निशानेबाजों में शुमार और दिग्गज शूटिंग कोच जसपाल राणा का 49 वर्ष की अल्पायु में निधन हो गया है। मिली जानकारी के अनुसार, कुछ समय पहले उन्हें गंभीर दिल का दौरा (हृदयघात) पड़ा था, जिसके बाद उन्हें दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में उपचार के लिए भर्ती कराया गया था।
डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके आकस्मिक निधन की खबर सामने आते ही पूरे देश, खेल जगत और विशेषकर उनके गृह राज्य उत्तराखंड में शोक की गहरी लहर दौड़ गई है।
जसपाल राणा ने न केवल एक खिलाड़ी के रूप में अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत का नाम रोशन किया, बल्कि एक उत्कृष्ट कोच के रूप में उन्होंने देश को कई विश्वस्तरीय निशानेबाज भी दिए। उनके जाने से भारतीय शूटिंग ने अपना सबसे मजबूत स्तंभ खो दिया है।
उत्तराखंड की माटी से निकलकर वैश्विक पटल पर छाए
जसपाल राणा का जन्म 28 जून 1976 को उत्तराखंड के सीमांत जिले उत्तरकाशी में हुआ था। वह मूल रूप से टिहरी गढ़वाल के नैनबाग चिलामू क्षेत्र के रहने वाले थे। खेल और राष्ट्र सेवा के गुण उन्हें विरासत में मिले थे; उनके पिता नारायण सिंह राणा भी उत्तराखंड सरकार में खेल मंत्री रह चुके हैं और उन्होंने जसपाल के करियर को संवारने में अहम भूमिका निभाई थी।
जसपाल राणा ने महज 18 साल की उम्र में वो कारनामा कर दिखाया था, जिसकी कल्पना उस दौर में भारतीय खेलों में कम ही की जाती थी। उन्होंने 1994 के हिरोशिमा एशियाई खेलों (Asian Games) में 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तहलका मचा दिया था। इतनी कम उम्र में एशियाई खेलों में देश का परचम लहराने वाले जसपाल को रातों-रात भारतीय शूटिंग टीम का ‘मशाल वाहक’ (Torch Bearer) माना जाने लगा था।
पदकों और कीर्तिमानों से भरा शानदार करियर
25 मीटर पिस्टल स्पर्धा में जसपाल राणा की महारत का कोई सानी नहीं था और उनकी एकाग्रता की मिसालें आज भी युवा निशानेबाजों को दी जाती हैं। एशियाई खेलों के अलावा राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth Games) में भी उन्होंने भारत की झोली में कई स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक डाले।
उनके नाम एक ऐसा अद्वितीय रिकॉर्ड दर्ज है जिसे तोड़ना आज भी किसी भी एथलीट के लिए एक बड़ा सपना है। वर्ष 1995 में चेन्नई और फिर 1999 में काठमांडू में आयोजित सैफ (SAIF) खेलों में उन्होंने लगातार 8-8 स्वर्ण पदक (टोटल 16 गोल्ड) जीतकर एक नया इतिहास रच दिया था। जब भी वे मैदान में उतरते थे, देश को उनसे सिर्फ और सिर्फ गोल्ड मेडल की उम्मीद होती थी।
अर्जुन पुरस्कार से द्रोणाचार्य तक का सफर
देश के प्रति उनके अद्वितीय योगदान और खेलों में असाधारण प्रदर्शन को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें समय-समय पर देश के सर्वोच्च नागरिक और खेल सम्मानों से नवाजा:
- वर्ष 1994: मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्हें प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- वर्ष 1997: उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से नवाजा गया।
- वर्ष 2020: एक सफल मार्गदर्शक और गुरु के रूप में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार (लाइफटाइम) से सम्मानित किया गया।
मनु भाकर के गुरु: कोचिंग में भी लहराया सफलता का परचम
एक सक्रिय खिलाड़ी के रूप में संन्यास लेने के बाद भी जसपाल राणा का खेल के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ। उन्होंने कोचिंग की कमान संभाली और भारतीय जूनियर राष्ट्रीय टीम के मुख्य कोच बने। उनकी पारखी नजरों ने देश के सबसे बेहतरीन युवा शूटरों को तराशने का काम किया। उनके मार्गदर्शन में सौरभ चौधरी और अनीस भनवाला जैसे प्रतिभावान निशानेबाज अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमके।
जसपाल राणा के कोचिंग करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर को तैयार करना रही। मनु भाकर ने वर्ष 2024 के पेरिस ओलंपिक में दो ऐतिहासिक कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा था, और इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे जसपाल राणा की कड़ी मेहनत, अनुशासन और सटीक रणनीतिक सूझबूझ की सबसे अहम भूमिका थी। मनु की इस कामयाबी ने जसपाल राणा को आधुनिक युग के सबसे सफल खेल गुरुओं की कतार में खड़ा कर दिया था।
हाल ही में, उनकी इसी असाधारण क्षमता को देखते हुए राष्ट्रीय राइफल संघ (NRAI) ने उन्हें 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा के लिए अपना ‘हाई-परफार्मेंस कोच’ भी नियुक्त किया था, ताकि वे भविष्य के ओलंपिक विजेताओं को तैयार कर सकें।
खेल जगत में पसरा सन्नाटा, शिष्यों ने दी श्रद्धांजलि
जसपाल राणा के इस तरह अचानक चले जाने से खेल प्रेमी और उनके शिष्य स्तब्ध हैं। सोशल मीडिया से लेकर खेल संघों तक, हर कोई नम आंखों से इस महान खिलाड़ी को याद कर रहा है। अभिनव बिंद्रा, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ समेत देश के तमाम दिग्गजों, राजनेताओं और खेल प्रेमियों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।
उनके शिष्यों का कहना है कि उन्होंने न सिर्फ शूटिंग की तकनीक सिखाई, बल्कि जीवन में कभी हार न मानने का जज्बा भी दिया। जसपाल राणा आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा तैयार किए गए निशानेबाज और भारतीय खेल जगत में उनके कीर्तिमान हमेशा अमर रहेंगे।









