उत्तराखंड में शराब के दाम बढ़ने की आशंका तेज हो गई है। आबकारी वेट (VAT) को लेकर वित्त विभाग और आबकारी विभाग के बीच मतभेद गहरा गया है। वित्त विभाग पुराने फार्मूले के आधार पर वेट लगाने की वकालत कर रहा है, जबकि आबकारी विभाग उत्तर प्रदेश की तरह वेट पूरी तरह खत्म करने का समर्थन कर रहा है। विवाद बढ़ने के बाद अब यह मामला मुख्य सचिव कार्यालय के पास भेजा जा रहा है, जहां अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
प्रदेश में आबकारी विभाग सबसे ज्यादा राजस्व देने वाले विभागों में शामिल है। पिछले वित्त वर्ष में विभाग ने 4500 करोड़ रुपये का राजस्व लक्ष्य पूरा किया था, जबकि वर्ष 2024–25 के लिए 5060 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया है। आबकारी विभाग का मानना है कि शराब की कीमतों को नियंत्रित करके ही यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
फिलहाल शराब की कीमत तय करते समय वेट की गणना एक्साइज ड्यूटी पर की जाती है और उसके बाद एमजीडी (मिनिमम गारंटी ड्यूटी) जोड़ी जाती है। पहले दोनों को जोड़कर वेट की गणना होती थी, जिससे वेट अधिक बनता था। लेकिन नए तरीके से वेट कम लग रहा है, जिसका फायदा सीधे शराब की कीमतों पर पड़ा है। कीमतें अपेक्षाकृत स्थिर रहने से तस्करी पर भी कुछ हद तक रोक लगी है, हालांकि हिमाचल और हरियाणा से अवैध शराब प्रवेश की समस्या बनी रहती है।
वित्त विभाग अब पुराने फार्मूले पर लौटने की बात कर रहा है। ऐसा हुआ तो वेट बढ़ेगा और इसके साथ ही शराब के दाम भी ऊपर जा सकते हैं। दूसरी ओर, आबकारी विभाग का तर्क है कि कीमतें नियंत्रित रहने से विभाग को 350–400 करोड़ रुपये का स्थिर राजस्व मिल रहा है। वहीं पुराने तरीके से वेट लगाने पर विभाग को मात्र 50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ ही मिलेगा, जो विभाग की कुल नीति और बाजार स्थिति के हिसाब से फायदेमंद नहीं माना जा रहा।
इस संबंध में आयुक्त आबकारी अनुराधा पाल ने कहा है कि यह पूरी तरह से नीतिगत मसला है और अंतिम फैसला उच्च स्तर पर लिया जाएगा। अब सबकी निगाहें मुख्य सचिव कार्यालय की ओर हैं, जहां से तय होगा कि प्रदेश में शराब के दाम स्थिर रहेंगे या फिर उपभोक्ताओं की जेब और ज्यादा ढीली करनी पड़ेगी।






