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उत्तराखंड के 70 गांवों में कीड़ा जड़ी का खज़ाना: 11 लाख प्रति किलो कीमती जड़ी ने बदली ग्रामीणों की किस्मत

On: November 13, 2025 10:25 AM
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पिथौरागढ़ जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र, गोरी गंगा घाटी के 70 गांवों में प्राकृतिक जड़ी कीड़ा जड़ी (यार्सागुम्बा) ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल दी है। इस कीड़े जैसी दिखने वाली जड़ी की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 11 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। इसकी बदौलत यहां के लोग मालामाल हो रहे हैं और लंबे समय से पलायन कर चुके परिवार अब अपने पैतृक गांवों में लौटने लगे हैं।
आर्थिक समृद्धि से आया सामाजिक बदलाव
गोरी गंगा घाटी के 2244 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इलाके में कुल 170 गांव बसे हैं, जिनकी आबादी करीब 43 हजार है। इनमें से 70 गांवों के 1881 परिवारों के 3425 लोग हर साल कीड़ा जड़ी के संग्रहण में लगे रहते हैं। 1995 में कनार गांव के ग्रामीणों ने सबसे पहले नेपाली मजदूरों की मदद से इसका दोहन शुरू किया था। 2001 के बाद से यह कारोबार पूरे क्षेत्र में फैल गया।
इस जड़ी की मांग भारत, नेपाल, तिब्बत के बाजारों से होते हुए चीन, हांगकांग, थाईलैंड, सिंगापुर और ताइवान तक पहुंचती है। वन विभाग इसे वन उपज के रूप में मान्यता देता है और संग्रहण, रॉयल्टी व निगरानी के लिए नियमानुसार प्रबंधन करता है।
बुग्यालों में पाया जाने वाला प्राकृतिक चमत्कार
कीड़ा जड़ी गोरी गंगा घाटी के 3200 से 5200 मीटर ऊंचाई वाले बुग्यालों में पाई जाती है। क्षेत्र में 79 प्रमुख बुग्याल हैं जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 352 वर्ग किलोमीटर है। इन ऊंचे क्षेत्रों में गर्मी के मौसम में ग्रामीण परिवार जड़ी संग्रह करने पहुंचते हैं और यहीं से उनकी सालभर की आमदनी तय होती है।
आय में जबरदस्त उतार-चढ़ाव
2010 से 2022 तक के अध्ययन के अनुसार, कीड़ा जड़ी का मूल्य 2010 में 5 लाख प्रति किलो था, जो 2013 और 2022 में बढ़कर 11 लाख प्रति किलो तक पहुंच गया। वर्ष 2022 में 70 गांवों में कुल 175 किलो से अधिक जड़ी एकत्र की गई।
2013 में प्रति परिवार औसत आय 1.37 लाख रुपये तक पहुंच गई, जबकि 2020 में यह घटकर लगभग 55 हजार रुपये रह गई।
शिक्षा और रहन-सहन में आया सुधार
कीड़ा जड़ी से हुई आय का ग्रामीणों ने सही उपयोग किया। शोध के अनुसार, 998 परिवारों ने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बच्चों की उच्च शिक्षा में लगाया। 142 परिवारों ने गांव के बाहर घर बनाए, 61 ने निजी वाहन खरीदे, 57 ने दुकानें खोलीं, जबकि 139 परिवारों ने पशुपालन शुरू किया।
रिवर्स पलायन की मिसाल
धारचूला-मुनस्यारी क्षेत्र में इस जड़ी से हुए आर्थिक बदलाव के बाद गांवों में रिवर्स पलायन देखने को मिला है। पहले जहां लोग रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रहे थे, वहीं अब लगभग आधे परिवार वापस लौट आए हैं। 2011 से 2022 के बीच 47.75% परिवारों ने जड़ी-बूटी संग्रह को मुख्य पेशा बनाया है, जबकि 25% से अधिक परिवार केवल अपने पैतृक गांवों से जुड़ाव के कारण लौटे हैं।
चिंता का विषय: अनियंत्रित दोहन से खतरा
कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर.सी. जोशी और डॉ. कवींद्र सिंह कठायत के अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है कि यदि कीड़ा जड़ी का अंधाधुंध दोहन जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में यह प्रजाति विलुप्त हो सकती है। सर्वेक्षण के अनुसार, 56% से अधिक परिवार इस खतरे को लेकर चिंतित हैं।
निष्कर्ष:
कीड़ा जड़ी ने उत्तराखंड के सुदूर गांवों में आर्थिक समृद्धि, शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली का नया द्वार खोला है, लेकिन इसके अनियमित दोहन से प्रकृति पर खतरा मंडरा रहा है। यदि इसका संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाए, तो यह जड़ी न केवल गांवों की अर्थव्यवस्था को संवार सकती है, बल्कि उत्तराखंड की पर्वतीय संस्कृति को भी मजबूत आधार दे सकती है।

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