देहरादून। राजधानी दून में नदियों का गला घोंटने का काम किस तरह से हुआ है, इसका खुलासा अब सैटेलाइट चित्रों ने कर दिया है। रिस्पना नदी, जिसे कभी दून की लाइफलाइन कहा जाता था, आज अतिक्रमण और जंगलों की कटाई से अस्तित्व खोने की कगार पर है। विशेषज्ञों का कहना है कि 2003 से 2018 के बीच नदी के किनारे भारी पैमाने पर निर्माण और जंगल का सफाया कर दिया गया। यही वजह है कि आज छोटी-सी अतिवृष्टि भी दून के लिए आपदा बन जाती है।
2003 से 2018 के बीच रिस्पना के किनारे उजड़े जंगल
एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. एमपीएस बिष्ट के अनुसार, राज्य गठन के कुछ ही साल बाद यानी वर्ष 2003 में रिस्पना नदी के दोनों किनारे पूरी तरह खाली थे। चारों ओर घना जंगल और प्राकृतिक हरियाली नजर आती थी। लेकिन महज 15 साल बाद, 2018 में स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी।
सैटेलाइट चित्र बताते हैं कि काठबंगला क्षेत्र, जो पहले पूरी तरह खुला और हरा-भरा था, अब पक्के मकानों और बस्तियों से भर चुका है। इतना ही नहीं, 15 साल के भीतर रिस्पना नदी का प्राकृतिक मार्ग भी लगभग गायब हो गया। जहां कभी 100 प्रतिशत जंगलनुमा क्षेत्र था, वहां आज सिर्फ 5 प्रतिशत हरियाली बची है।
अतिवृष्टि और बादल फटने से उजागर हुई सच्चाई
हाल ही में सहस्त्रधारा क्षेत्र में बादल फटने और अतिवृष्टि के बाद हालात ने एक बार फिर खतरे की घंटी बजा दी। लोगों ने साफ देखा कि नदियों के प्राकृतिक रास्तों को रोकने और अतिक्रमण करने का अंजाम कितना खतरनाक हो सकता है। विशेषज्ञ लंबे समय से चेताते आ रहे हैं कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करना आत्मघाती है, लेकिन दून में इस सबक को पूरी तरह भुला दिया गया।
यूसैक के पास कैद हैं 2100 सैटेलाइट चित्र
देहरादून और आसपास के नदी क्षेत्रों में बढ़ते अतिक्रमण को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाया था। इसके बाद उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) ने इसरो के जरिए अमेरिकी कंपनी मैक्सर से शहर के सभी वार्डों के सैटेलाइट चित्र मंगाए थे।
करीब 2100 चित्र हर छह माह पर लिए गए थे ताकि अतिक्रमण की स्थिति पर निगरानी रखी जा सके। लेकिन अफसोस, इन चित्रों का इस्तेमाल कभी नहीं हुआ। सरकारी मशीनरी ने कार्रवाई करने के बजाय इन्हें यूसैक कार्यालय में ही डंप कर दिया।
जब यूसैक टीम को बस्तियों में घुसने नहीं दिया गया
हाईकोर्ट के आदेश के बाद यूसैक ने न सिर्फ चित्रों का अध्ययन किया बल्कि जमीनी हकीकत जानने के लिए सर्वे की भी कोशिश की। कई मलिन बस्तियों में टीम पहुंची, लेकिन स्थानीय विरोध के चलते उन्हें अंदर जाने ही नहीं दिया गया।
राजनीतिक हस्तक्षेप और वोटबैंक की मजबूरी के चलते प्रशासन चुपचाप मूकदर्शक बना रहा। धीरे-धीरे विरोध इतना बढ़ा कि अतिक्रमण का सर्वे भी बीच में ही रोकना पड़ा।
खतरे की घंटी बजा रही रिस्पना
आज स्थिति यह है कि रिस्पना नदी का अधिकांश हिस्सा अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुका है। जंगल उजड़ गए हैं, नदी का प्रवाह सिकुड़कर रह गया है और हर बारिश के साथ आपदा का खतरा और बढ़ रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अब भी कठोर कदम नहीं उठाए गए तो दून में न सिर्फ बाढ़ और जलभराव बढ़ेगा बल्कि भविष्य में बड़े पैमाने पर जानमाल का नुकसान भी तय है।
दून में रिस्पना और बिंदाल नदियों पर अतिक्रमण केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि यह शहर की सुरक्षा, जीवन और भविष्य से सीधा जुड़ा हुआ मुद्दा है।
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