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हरिद्वार जमीन घोटाले पर धामी सरकार का बड़ा एक्शन, दो IAS और एक PCS अफसर समेत 12 सस्पेंड

On: June 3, 2025 8:29 AM
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उत्तराखंड के हरिद्वार में सामने आए एक बड़े जमीन घोटाले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सख्त रुख अपनाते हुए प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा हस्तक्षेप किया है। मामले में दो आईएएस, एक पीसीएस और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों सहित कुल 12 लोगों को निलंबित कर दिया गया है। यह निर्णय घोटाले की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सामने आने के तुरंत बाद लिया गया, जिससे साफ संकेत मिलता है कि अब राज्य सरकार ऐसे भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

यह जमीन घोटाला उस समय उजागर हुआ जब हरिद्वार नगर निगम द्वारा मात्र 15 करोड़ रुपये की एक अनुपयुक्त और बेकार भूमि को 54 करोड़ रुपये में खरीदा गया। न तो इस जमीन की तत्काल कोई आवश्यकता थी, न ही खरीद प्रक्रिया में कोई पारदर्शिता बरती गई। इस खरीद में शासन के नियमों की खुलेआम अनदेखी की गई और नियमों को दरकिनार करते हुए यह सौदा पूरा किया गया।

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घोटाले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने हरिद्वार के जिलाधिकारी कर्मेन्द्र सिंह, पूर्व नगर आयुक्त वरुण चौधरी, और एसडीएम अजयवीर सिंह को तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया। इनके साथ ही वरिष्ठ वित्त अधिकारी निकिता बिष्ट, कानूनगों राजेश कुमार, तहसील प्रशासनिक अधिकारी कमलदास, और वरिष्ठ वैयक्तिक सहायक विक्की को भी सस्पेंड किया गया है।

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इस कार्रवाई से उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था में अब तक का सबसे कड़ा संदेश गया है। राज्य के इतिहास में यह पहली बार है जब सरकार ने अपने ही सिस्टम में बैठे शीर्ष अफसरों पर इतनी कठोर कार्रवाई की है। मुख्यमंत्री धामी के इस कदम को केवल एक घोटाले की कार्रवाई न मानकर प्रशासनिक संस्कृति में एक निर्णायक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

इससे पहले, कार्रवाई के पहले चरण में नगर निगम के प्रभारी सहायक नगर आयुक्त रविंद्र कुमार दयाल, अधिशासी अभियंता आनंद सिंह मिश्रवाण, कर एवं राजस्व अधीक्षक लक्ष्मीकांत भट्ट, और अवर अभियंता दिनेश चंद्र कांडपाल को भी निलंबित किया गया था। वहीं, संपत्ति लिपिक वेदवाल का सेवा विस्तार समाप्त कर दिया गया है और उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई के निर्देश भी जारी कर दिए गए हैं।

अब यह मामला विजिलेंस जांच के अधीन है, जिससे पूरे घोटाले की तह तक जाने की तैयारी हो चुकी है। यह कार्रवाई न केवल प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक अहम कदम है, बल्कि प्रदेश की राजनीति में पारदर्शिता और जवाबदेही की नई मिसाल भी बन सकती है।

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