उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था एक बार फिर ठप होती नजर आ रही है। ग्राम, क्षेत्र और जिला पंचायतों में नियुक्त प्रशासकों का कार्यकाल अब समाप्त हो चुका है, लेकिन अब तक चुनाव नहीं हो पाने के कारण ये पंचायतें फिलहाल खाली रह जाएंगी। नई प्रशासक नियुक्तियों के लिए जरूरी अध्यादेश को लेकर तकनीकी अड़चनें सामने आ रही हैं।
मामला पंचायती राज एक्ट में संशोधन से जुड़ा है। सरकार ने प्रशासकों की पुनर्नियुक्ति के लिए एक्ट में बदलाव के उद्देश्य से अध्यादेश राजभवन भेजा था, लेकिन विधायी विभाग ने हरिद्वार से जुड़ी पुरानी आपत्ति का हवाला देते हुए इसे लौटा दिया। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का स्पष्ट निर्देश है कि कोई भी अध्यादेश यदि एक बार खारिज हो चुका हो तो उसे दोबारा उसी रूप में नहीं लाया जा सकता। इसे संविधान के विरुद्ध माना जाता है।
हरिद्वार जिले में पहले भी ऐसी स्थिति बनी थी, जब पंचायतों में चुनाव नहीं हो पाने के कारण प्रशासक नियुक्त किए गए थे। बाद में जब चुनाव हुए, तो अध्यादेश को विधानसभा से पारित नहीं कराया गया, जिससे वह कानून में तब्दील नहीं हो सका। अब दोबारा वैसा ही अध्यादेश लाने पर आपत्ति उठी है और इसे संशोधित रूप में फिर से राजभवन भेजा गया है।
राज्य में फिलहाल हरिद्वार की 318 पंचायतों को छोड़कर कुल 10,760 पंचायतें (7478 ग्राम, 2941 क्षेत्र और 341 जिला पंचायतें) खाली हो चुकी हैं। इनमें ग्राम पंचायतों के प्रशासकों का कार्यकाल चार दिन पहले समाप्त हो गया, जबकि क्षेत्र पंचायतों का दो और जिला पंचायतों का कार्यकाल एक जून को खत्म हो चुका है। अब सभी की निगाहें इस संशोधित अध्यादेश की स्वीकृति और पंचायत व्यवस्था की बहाली पर टिकी हैं।
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