देहरादून निवासी और भारतीय सेना के जांबाज़ अधिकारी कैप्टन दीपक सिंह को उनकी अद्वितीय बहादुरी और देशभक्ति के लिए मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिल्ली में आयोजित एक समारोह में उनके माता-पिता, चंपा सिंह और महेश सिंह को यह वीरता पदक सौंपा। सम्मान ग्रहण करते वक्त माता-पिता की आंखें नम हो गईं, लेकिन दिल गर्व से भरा हुआ था।

डोडा मुठभेड़ में दिखाया असाधारण साहस
14 अगस्त 2024 को जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले के शिवगढ़ धार क्षेत्र में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान कैप्टन दीपक सिंह वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन्हें खुफिया इनपुट मिला था कि कुछ आतंकी इलाके में छिपे हैं। उन्होंने तुरंत अपनी टुकड़ी संग मोर्चा संभाला और रातभर आतंकियों को जवाब देते रहे।
पूरी रात टुकड़ी संग डटे रहे मोर्चे पर
कठिन परिस्थितियों और अंधेरे के बावजूद कैप्टन दीपक सिंह ने आतंकियों की घेराबंदी कर एक को घायल कर दिया। अगली सुबह जब सर्च ऑपरेशन शुरू हुआ, तो एक घायल आतंकी ने अचानक फायरिंग कर दी। इस दौरान कैप्टन दीपक ने अपने साथी की जान बचाई और खुद आगे बढ़कर आतंकियों का सामना किया। इस संघर्ष में वह गंभीर रूप से घायल हो गए और अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।
25 वर्ष की उम्र में देश पर न्योछावर
कैप्टन दीपक सिंह महज 25 साल के थे और देहरादून के कुआंवाला क्षेत्र के रहने वाले थे। वे कॉर्प्स ऑफ सिग्नल्स की 48 राष्ट्रीय राइफल्स यूनिट में तैनात थे। तीन भाई-बहनों में सबसे छोटे दीपक अपने परिवार का अभिमान थे। उनके पिता महेश सिंह उत्तराखंड पुलिस से सेवानिवृत्त हैं और शौर्य चक्र लेते वक्त उनकी मां चंपा सिंह भावुक हो उठीं।
त्योहार से पहले शहादत, बहनें करती रहीं इंतज़ार
दीपक सिंह की शहादत रक्षाबंधन से ठीक पहले हुई थी। उनकी बहनों ने राखी बांधने के लिए भाई का इंतजार किया, लेकिन वह देश की रक्षा करते हुए अमर हो चुके थे। पिता महेश सिंह ने कहा, “मैं अपनी आंखों से एक भी आंसू नहीं बहाऊंगा, क्योंकि मेरा बेटा देश के लिए शहीद हुआ है।”
पूरा उत्तराखंड हुआ गर्वित
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी समेत कई गणमान्य लोगों ने शहीद कैप्टन को श्रद्धांजलि दी। गणेश जोशी ने कहा, “उत्तराखंड का हर बच्चा देश की सेवा को तैयार है। कैप्टन दीपक सिंह की वीरता आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल है।”
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