देश की राजधानी दिल्ली के प्रशासनिक और राजनैतिक गलियारों में आज उस वक्त एक बड़ी हलचल मच गई जब राष्ट्रपति भवन से उपराज्यपालों और राज्यपालों की नई नियुक्तियों की आधिकारिक सूची जारी की गई। इस फेरबदल का सबसे बड़ा केंद्र दिल्ली रहा, जहाँ भारतीय विदेश सेवा के पूर्व दिग्गज अधिकारी तरनजीत सिंह संधू को नया उपराज्यपाल नियुक्त किया गया है। संधू की यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि इसे केंद्र सरकार की दिल्ली के प्रति एक नई और गंभीर रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। वह विनय कुमार सक्सेना का स्थान लेंगे, जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली के उपराज्यपाल के रूप में काफी सक्रिय और चर्चा में रहने वाली भूमिका निभाई थी। अब विनय सक्सेना को केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जो सामरिक दृष्टि से भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
तरनजीत सिंह संधू का व्यक्तित्व और उनका अब तक का करियर काफी प्रभावशाली रहा है। १९८८ बैच के भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी के रूप में उन्होंने दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। विशेष रूप से फरवरी २०२० से जनवरी २०२४ तक अमेरिका में भारत के राजदूत के रूप में उनका कार्यकाल ऐतिहासिक माना जाता है। उनके समय में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, तकनीक और व्यापारिक समझौतों में एक नई मजबूती आई थी। कूटनीति के मैदान में अपनी बात को शालीनता लेकिन मजबूती से रखने के लिए जाने जाने वाले संधू ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति की मुख्यधारा में प्रवेश किया। २०२४ में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली और अमृतसर से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा। हालांकि चुनावी परिणाम उनके पक्ष में नहीं रहे, लेकिन केंद्र सरकार ने उनके अनुभव और प्रशासनिक क्षमता पर भरोसा जताते हुए उन्हें दिल्ली जैसे जटिल और हाई-प्रोफाइल केंद्र शासित प्रदेश की कमान सौंपी है।
दिल्ली का उपराज्यपाल पद हमेशा से चुनौतियों और विवादों के केंद्र में रहा है, खासकर तब जब दिल्ली में सत्तासीन आम आदमी पार्टी और केंद्र के बीच अधिकारों की जंग जारी हो। विनय कुमार सक्सेना के कार्यकाल के दौरान भी यह स्थिति साफ नजर आई। २६ मई २०२२ को अनिल बैजल के इस्तीफे के बाद जब सक्सेना ने पदभार संभाला था, तब से लेकर आज तक दिल्ली सरकार और राजनिवास के बीच कई मुद्दों पर तीखी बहस और कानूनी लड़ाइयां देखने को मिलीं। शराब नीति कांड से लेकर फाइलों को रोकने और अधिकारियों के तबादलों तक, विनय सक्सेना का कार्यकाल पूरी तरह से एक्शन मोड में रहा। अब जब उन्हें लद्दाख भेजा गया है, तो माना जा रहा है कि वहां के विकास और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने में उनके अनुभव का लाभ लिया जाएगा।
गुरुवार को हुई इन नियुक्तियों की फेहरिस्त काफी लंबी है, जो यह दर्शाती है कि केंद्र सरकार राज्यों के प्रशासनिक ढांचे में एक बड़ा रिफ्रेश बटन दबा रही है। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला को अब तेलंगाना की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि तेलंगाना के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा को महाराष्ट्र जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से सक्रिय राज्य का राज्यपाल बनाया गया है। इसी कड़ी में नंद किशोर यादव को नागालैंड की कमान सौंपी गई है और सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन को बिहार का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है। इसके अलावा, दक्षिण भारत में भी बदलाव देखने को मिले हैं, जहाँ तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि को पश्चिम बंगाल भेजा गया है और केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर अब तमिलनाडु की जिम्मेदारी संभालेंगे। साथ ही, लद्दाख के उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता को हिमाचल प्रदेश का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है।
तरनजीत सिंह संधू के दिल्ली आने से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि दिल्ली और केंद्र के बीच के रिश्तों में शायद एक नया मोड़ आए। एक मंझे हुए राजनयिक होने के नाते संधू को पेचीदा मामलों को सुलझाने का हुनर आता है। दिल्ली में जहां आए दिन एलजी और मुख्यमंत्री के बीच विवाद सुर्खियां बनते हैं, वहां संधू की कूटनीतिक कार्यशैली क्या बदलाव लाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा। दिल्ली की जनता और राजनैतिक विश्लेषक अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि संधू का यह नया सफर राजधानी के विकास और यहां की प्रशासनिक व्यवस्था को किस दिशा में ले जाता है। यह बदलाव केवल चेहरों का नहीं, बल्कि दिल्ली की शासन व्यवस्था में एक नई ऊर्जा और दृष्टिकोण भरने की केंद्र सरकार की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है।
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